#प्रेरणादायक कहानी: सोच
हम कभी-कभी अपनी सोच और अपने ही अहंकार के वशीभूत होकर अपनी ही सोच को दूसरे पर लागू कर देते हैं जबकि दूसरे की परिस्थिति कभी-कभी विपरीत भी हो सकती हैं अतः हमें एक संवेदनशील व्यक्ति की तरह सोचना चाहिए और सोच को सकारात्मक रखना चाहिए जो कि अपने और दूसरों के हित में हो ।
इस कहानी में रितेश और रमेश दो किरदार हैं एक अपने दिमाग में दूसरे के प्रति नफरत को भर देता है जबकि दूसरा अपनी जिंदगी को बनाने के लिए सब कुछ छोड़ कर के केंद्रित होकर अपने ही मकसद को पूरा करने पर लगा रहता है क्योंकि वह सही निष्ठा के साथ मैं अपने कर्तव्य के प्रति वफादार है आगे की कहानी जानने के लिए आपको इस कहानी को पूरा पढ़ना होगा इसीलिए कृपया आगे की कहानी ध्यान से भावात्मकता के साथ में पढ़िए गा।
सोच
रितेश ने जब आईना मैं अपने आपको देखा तो उसके मन से उसे आवाज आई "तुतलाना मेरी समस्या है और मैं हार नहीं मान सकता" , और वह इसका हल निकालने की युक्ति सोचने लगा ।
अगले दिन वह स्कूल के लिए निकल रहा था कि अचानक उसकी नजर मेंज पर पड़े अखबार पर पड़ी उसमें डॉक्टर पीके शर्मा जो कि सर्जन थे उनके बारे में लिखा था । उन्होंने कई लोगों को हकलाने और तुतलाने की समस्या का समाधान किया था । यह पढ़कर रितेश को चैन आया पर उनकी फीस बहुत ज्यादा थी और रितेश मध्यमवर्गीय परिवार से था तो उसने अपने घर की परिस्थिति जानकर यह बात अपनी मम्मी पापा को नहीं बताई जब वह स्कूल पहुंचा तो उसकी मैंम ने पूरी क्लास को बताया कि इस बार जो बच्चा क्लास में फर्स्ट डिवीजन से पास होगा और साथ ही अन्य प्रतियोगिता में शामिल होकर अच्छे व्यवहार का परिचय देगा तो उस बच्चे को स्कॉलरशिप दी जाएगी अब रितेश को अपनी मंजिल पाने के लिए रास्ता नजर आया वह रात दिन पढ़ाई मैं मेहनत करने लगा ।
पहले रितेश औसत दर्जे का छात्र था लेकिन इस बार वह अर्धवार्षिक में प्रथम श्रेणी के नंबर लाया। रितेश की यह सफलता कक्षा में प्रथम आने वाले रमेश को बहुत खली । अब वह रितेश से चिड़चिड़ा रहने लगा अब स्कूल में जब प्रतियोगिता शुरू हुई तो उसमें भी रितेश प्रथम आया लेकिन भाषण प्रतियोगिता में उसके भाग न लेने पर रमेश ने उसे उसके तुतलाने पर चढ़ाना शुरू कर दिया।
रितेश ने इस बात पर क्रोध नहीं किया बल्कि दुगनी मेहनत से वार्षिक परीक्षाओं के लिए मेहनत करने लगा क्योंकि उसकी नजर में सिर्फ उसका लक्ष्य उसके सामने था ।अतः अंत में रितेश वार्षिक परीक्षाओं में भी अव्वल आया । जिस पर रमेश खींच गया और रितेश को बुरा भला कहने लगा इतना तू तुतलाता है न जाने चीटिंग की होगी जरूर । पर इतना बुरा भला सुनने के बाद भी जब रितेश ने रमेश को कुछ नहीं कहा ।
फिर रमेश चिल्लाया अब कुछ बोलता क्यों नहीं मुंह में दही जमा के ही खड़े रहेगा क्या रितेश की आंखों में आंसू छलक आए उसने तुतलाते हुए कहा-" दोस्त सही वक्त आने पर बोलूंगा"। और वहां से चला गया सभी बच्चे हंसने लगे पर रमेश को अपनी गलती का एहसास हुआ किंतु वह अपने घमंड के कारण रितेश को सॉरी न कह सका ।
कुछ वक्त बाद एक दिन रमेश ने जब अपना टीवी खोल कर देखा तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ उसने टीवी में मधुर आवाज के साथ मस्त अंदाज में अपने सहपाठी रितेश को एंकरिंग करते देखा यह देख कर वह हतप्रभ रह गया। उसने जल्दी ही रितेश के घर जाने का सोचा पर वह अपने झूठे इनकार अहंकार के चलते गया नहीं ।अगले दिन रमेश रितेश को अपने दरवाजे पर खड़ा देख चौक पढ़ा तभी रितेश बोला -"दोस्त मैं प्रथम आया था क्योंकि मुझे स्कॉलरशिप पाकर अपने सपने को साकार करना था मैंने चीटिंग नहीं की थी , बल्कि मेरे अंदर अपने लक्ष्य को साधने का जुनून था"। और यह सुनकर रमेश बहुत शर्मिंदा हुआ बोला मुझे रितेश माफ करो ।मैं अपनी घमंडी सोच में तुमको क्या क्या बोला मुझे स्कूल के आखिरी दिन अपनी गलती का एहसास हुआ पर अहंकार वश माफी न मांग पाया ।
रितेश ने रमेश को माफ कर दिया और अब दोनों की कभी न टूटने वाली दोस्ती हो गई थी।
निष्कर्ष अपनी सोच को सदैव सकारात्मक तथा ईर्ष्या व अहंकार से मुक्त रखना चाहिए।



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